
कई फिल्में इतनी असरदार होती हैं कि उनके सीक्वल से दर्शकों की उम्मीदें काफी बढ़ जाती हैं। लेकिन हर फिल्म ‘हेरा फेरी’ जैसी फ्रेंचाइजी नहीं बन सकती। कुछ यही हाल ‘रेड 2’ का भी है। अजय देवगन एक बार फिर आईआरएस ऑफिसर अमय पटनायक के रोल में लौटे हैं, जबकि रितेश देशमुख इस बार नए विलेन के तौर पर छा गए हैं। कहानी में कुछ ट्विस्ट तो हैं, लेकिन वे देर से आते हैं और तब तक फिल्म पुराने फॉर्मूले पर ही टिकी रहती है। अच्छी बात ये रही कि बेहतरीन एक्टर्स की मौजूदगी ने फिल्म की लाज बचा ली।
कहानी की बात करें तो…
फिल्म की शुरुआत होती है ईमानदार और साहसी आईआरएस अधिकारी अमय पटनायक से, जिन्हें देशभर में उनकी ईमानदारी और मजबूती के लिए जाना जाता है। इस बार वह अपने करियर के सबसे चुनौतीपूर्ण केस की जांच कर रहे हैं—जिसमें भ्रष्टाचार, साजिश और सत्ता का दुरुपयोग सब कुछ शामिल है। उनका सामना होता है एक नए, ताकतवर और भ्रष्ट नेता ‘दादा मनोहर भाई’ से, जिसकी भूमिका निभाई है रितेश देशमुख ने।
जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, अमय पटनायक धोखे, राजनीति और दबाव के जाल में उलझते जाते हैं। जहां पहली फिल्म रियलिज्म और सस्पेंस पर आधारित थी, वहीं ‘रेड 2’ थोड़ा ज्यादा ड्रामेटिक नजर आती है। फिल्म में राजनीति, भ्रष्टाचार और पारिवारिक समीकरणों का एक कॉम्प्लेक्स तानाबाना है। हालांकि कुछ हिस्सों में स्क्रिप्ट कमजोर लगती है और कहानी बिखरती हुई नजर आती है।
अभिनय पर नज़र डालें तो…
अजय देवगन ने एक बार फिर अमय पटनायक के किरदार को बेहतरीन ढंग से निभाया है। संयम और दृढ़ता से भरे उनके अभिनय में वही पुरानी छाप नजर आती है। लेकिन फिल्म की असली जान हैं रितेश देशमुख, जिन्होंने एक ग्रे शेड किरदार को भी पूरी गंभीरता से निभाया है। ये उनके करियर के सबसे अलग और दमदार रोल्स में से एक है।
वाणी कपूर को भले ही सीमित स्क्रीन टाइम मिला है, लेकिन वो भी अपनी भूमिका में फिट दिखती हैं। सौरभ शुक्ला की मौजूदगी पुराने भाग की याद दिलाती है, हालांकि उनका रोल इस बार ज्यादा प्रभावशाली नहीं रहा। सुप्रिया पाठक का किरदार अहम था, लेकिन उनकी ओवरएक्टिंग ने कई सीन्स का असर कम कर दिया। वहीं, अमित सियाल एक मजबूत सहायक किरदार में उभरे हैं और फिल्म में बड़ा मोड़ उनके ही जरिए आता है।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
‘रेड’ जैसी क्लासिक फिल्म के बाद इसका सीक्वल डायरेक्टर राज कुमार गुप्ता से काफी उम्मीदें लेकर आया था। लेकिन इस बार उनका निर्देशन उतना प्रभावशाली नहीं रहा। फिल्म की धीमी शुरुआत और कुछ गैरज़रूरी गाने इसकी रफ्तार को कमजोर करते हैं। स्क्रिप्ट की एडिटिंग थोड़ी टाइट होती तो शायद कहानी और ज्यादा असरदार लगती। पहला हाफ खासा धीमा है और असली ट्विस्ट फिल्म के सेकंड हाफ में ही आता है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘रेड 2’ अपने पहले भाग की ऊंचाइयों को नहीं छू पाती, लेकिन फिर भी यह एक बार देखने लायक फिल्म है। अजय देवगन और रितेश देशमुख का अभिनय, खासकर रितेश का नया अंदाज, फिल्म को पकड़ में रखता है। यदि आप सस्पेंस-ड्रामा के शौकीन हैं और शानदार परफॉर्मेंस देखना चाहते हैं, तो ‘रेड 2’ को एक मौका दिया जा सकता है।
रेटिंग: ⭐⭐⭐ (3/5)





